स्वच्छता की सनक , और गंदगी से घृणा, का सिद्धांत लिए हर दिन, अंतस, ताज़े धुले तौलिये में लिपट जाता था .. कुछ पल का जो खुलापन आता है बीच में, वो कभी अखर जाता , और कभी मैं देखती ही नहीं उधर , लेकिन देख रही हूँ , मुझे भी आदत होती जा रही है, काव्य और कलाओंमें घिसटती हुई गन्दगी को , निर्विकार भाव से देखने की | विडंबना तो है, लेकिन, अब गन्दगी से घृणा नहीं होती, धीरे-धीरे वो अपना असर खो रही है.. शायद, उसने, नापसंदगी का दर्ज़ा पा लिया है.. बड़ा सूक्ष्म सा अंतर है , घृणा और नापसंदगी में | सोचती हूँ, जब गन्दगी से दो-चार होना ही है , तो फिर घृणा क्यों, नापसंदगी क्यों नहीं ? आख़िर, कभी-कभी , बिन धुले तौलिये से भी, बेमन ही सही, हम बदन पोंछ ही लेते हैं ..
और अब एक और गीत..आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे....आवाज़ 'अदा' की..
Kenny Rogers — Lucille Songwriters: Bowling, Roger;Bynum, Hal
गाना यहाँ है....संतोष शैल की आवाज़ में...
In a bar in Toledo across from the depot
On a bar stool she took off her ring
I thought I'd get closer so I walked on over
I sat down and asked her name
When the drinks finally hit her
She said I'm no quitter
but I finally quit livin on dreams
I'm hungry for laughter and here ever after
I'm after whatever the other life brings
टोलेडो (जगह का नाम ) में डिपो के सामने वाले बार में
वो स्टूल पर बैठी थी और उसने वहीँ अपनी अंगूठी उतार दी..
मैंने उसे ऐसा करते हुए देखा और सोचा थोड़ा उसके करीब आ जाऊं
मैं उठ कर उसके पास चला गया, फिर उससे उसका नाम पूछा..
हम दोनों में जाम का एक दौर चला..और जब उसे शराब थोड़ी चढ़ गयी
उसने कहा ..यूँ तो मैं हारने वालों में से नहीं हूँ, लेकिन मैं सिर्फ सपनो के साथ अब नहीं जी सकती
मैं हंसी की भूखी हूँ और आज के बाद ज़िन्दगी से जो भी मुझे मिलेगा वो मंज़ूर होगा..
In the mirror I saw him and I closely watched him
I thought how he looked out of place
He came to the woman who sat there be-side me
He had a strange look on his face
The big hands were calloused he looked like a mountain
For a minute I thought I was dead
But he started shaking his big heart was breaking
He turned to the woman and said
तभी मैंने आईने में उसे देखा और मैंने गौर किया
मैंने देखा वो उस माहौल से परे था.
वो उस औरत के पास आया जो मेरे पास बैठी थी
उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे
उसके हाथ खुरदुरे थे और शरीर पर्वत सा विशाल था
एक पल के लिए मुझे लगा की वो मुझे मार ही डालेगा
पर वो कांपने लगा उसका दिल टूट रहा था
और उसने उस महिला से कहा
You picked a fine time to leave me Lucille
With four hungry children and a crop in the field
I've had some bad times lived through some sad times
this time your hurting won't heal
You picked a fine time to leave me Lucille.
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
चार भूखे बच्चों और खेत में खड़ी फसल के साथ
मैंने बुरे दिन देखे हैं, दुःख भरे दिन भी गुज़ारे हैं
लेकिन इस बार का दर्द नहीं झेला जाएगा
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
After he left us I ordered more whisky
I thought how she'd made him look small
From the lights of the bar room
To a rented hotel room
We walked without talking at all
She was a beauty but when she came to me
She must have thought I'd lost my mind
I could'nt hold her 'cos the words that told her
Kept coming back time after time
उसके जाने के बाद मैंने और विस्की आर्डर किया
मैंने सोचा उस महिला ने उस आदमी को कितना छोटा महसूस करा दिया
बार रूम की रौशनी से किराए के कमरे तक
हम दोनों बिना बात किये चलते गए
वो खूबसूरत थी और जब वो मेरे पास आई
तो उसने सोचा होगा की मैंने अपना होशो हवास खो दिया होगा
मैं उसे थाम न सका क्यूंकि
उस आदमी की बातें बारबार मुझे याद आतें रहीं
You picked a fine time to leave me Lucille
With four hungry children and a crop in the field
I've had some bad times lived through some sad times
this time your hurting won't heal
You picked a fine time to leave me Lucille.
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
चार भूखे बच्चों और खेत में खड़ी फसल के साथ
मैंने बुरे दिन देखे हैं, दुःख भरे दिन भी गुज़ारे हैं
लेकिन इस बार का दर्द नहीं झेला जाएगा
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
You picked a fine time to leave me Lucille
With four hungry children and a crop in the field
I've had some bad times lived through some sad times
But this time your hurting won't heal
You picked a fine time to leave me Lucille.
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
चार भूखे बच्चों और खेत में खड़ी फसल के साथ
मैंने बुरे दिन देखे हैं, दुःख भरे दिन भी गुज़ारे हैं
लेकिन इस बार का दर्द नहीं झेला जाएगा
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
You picked a fine time to leave me Lucille
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
You picked a fine time to leave me Lucille
लुसिल तुमने मुझे छोड़ने का अच्छा समय चुना
इस
बात में दो राय नहीं कि हिंदी की दुर्दशा दिखाई देती है, कारण सिर्फ
बाजारवाद नहीं, अंग्रेजी की चमक इतनी तेज़ है कि लोग उससे बच नहीं
पाते...और हमारी सरकार भी छीछा-लेदर करने से बाज़ नहीं आती, हिंदी के
उत्थान की आवश्यकता, उतनी नहीं है जितनी उसे दिल से अपनाने की है, हिंदी आज शक़ के घेरे में है, हिंदी पर अब लोगों को विश्वास नहीं है, अपनी
बात हिंदी में कहने में लोग कतराते हैं....उन्हें ये लगता है कि सामने
वाले पर धौंस ज़माना हो, तो बात हिंदी में नहीं, अंग्रेजी में करो...और
सच्चाई भी यही है...जो बात आप हिंदी में कहते हैं, वो कम असर करती, और
जैसे ही आपने अंग्रेजी में बात करनी शुरू की, आपका स्तर सामने वाले की नज़र
में एकदम से उछाल मारता है ...बेशक आपने अंग्रेजी की टांग ही तोड़ कर रख दी
हो....ब्लॉग जगत में भी अंग्रेजी के वड्डे-वड्डे तीर चलते हुए देखा है, और
लोगों को चारों खाने चित्त होते हुए भी...हाँ, तो हम बात कर रहे थे, इसी
फार्मूले की...ये मेरा आजमाया हुआ फ़ॉर्मूला है...कसम से हम कहते हैं, एकदम सुपट काम करता है..
पेशे ख़िदमत है एक आपबीती ...
मैं
रांची में थी और मुझे इन्टनेट कनेक्शन चाहिए था ...उसके लिए जाने
क्या-क्या कार्ड्स चाहिए थे और मेरे पास वो कार्ड्स नहीं हैं, ख़ैर मेरी
दोस्त उर्सुला ने मेरा उद्धार करने की सोची ...उसने आवेदन दिया, हमलोगों ने
टाटा का फ्लैश ड्राइव खरीदा और कनेक्शन के लिए हमलोगों से ये वादा किया
गया कि दूसरे दिन तक हो जाएगा ...मैं अपना लैपटॉप लेकर तैयार बैठी
थी...दूसरे दिन दोपहर तक कनेक्शन का नाम-ओ-निशाँ नहीं था...मैंने फ़ोन
लगाया उसी जगह जहाँ से इन्टरनेट कनेक्शन लिया था ...उनका कहना था कि आपको
कनेक्शन इसलिए नहीं मिला, क्योंकि हम पता का सत्यापन अर्थात एड्रेस
वेरिफिकेशन के लिए गए थे लेकिन वहाँ कोई नहीं था...मेरा अगला सवाल था आप कब
गए थे वेरिफिकेशन के लिए ...उन्होंने जवाब दिया जी ११ बजे के क़रीब गए
थे....मैंने तपाक एक और सवाल दागा..आप इस वक्त कहाँ हैं ...उनका जवाब था जी
हम तो ऑफिस में हैं...मैंने कहा अभी कितने बज रहे हैं ...उन्होंने कहा जी
१२.३० ...मैंने कहा आप ऑफिस में क्यों हैं...आपको तो घर पर होना चाहिए
था...वो बन्दा कुछ उलझा-उलझा सा हो गया...कहने लगा क्यों मैम घर पर क्यों,
मैंने कहा कि मुझे लगा आप भी वेले ही बैठे हो.. तो घर में रहो...क्योंकि
अगर आप ११ बजे एड्रेस वेरिफिकेशन के लिए किसी के घर जाते हो...और ये उम्मीद
करते हो कि वो घर में ही पलंग पर बैठा हो...तो बंदा तो वेल्ला ही होगा
न...वर्ना शरीफ लोग जो नौकरी-चाकरी करते हैं, वो तो ९ बजे ही दफ़्तर पहुँच
जाते हैं न ! बन्दा समझदार था...समझ गया था कि ग़लत जगह पंगा ले रहा
है...कहने लगा मैम आपकी बात सही है...लेकिन मैं तो बस एक मुलाजिम हूँ...आप
क्यों नहीं हमारे मैनेजर से बात करती हैं...मैंने कहा, बच्चे, अब मैं मनेजर
नहीं मैनेजिंग डाइरेक्टर से बात करुँगी...अब मुझे उनका फ़ोन नम्बर
दो...ख़ैर उसने मुझे एम्.डी. का नंबर दिया, मैंने फ़ोन किया और जब तक मैं
हिंदी में बात करती रही, एम्. डी. साहेब मुझे टहलाते रहे, उनकी बन्दर
गुलाटी देख मैंने भी अपना रंग बदलने की सोची....और जैसे ही मैंने अपना रंग
बदला, वो मुझे सिरिअसली लेने लगे, फिर मैंने वो अंग्रेजी झाड़ी कि उन्हें
भी लगने लगा ...I can leave angrej behind ...मेरा इन्टरनेट कनेक्शन १५
मिनट में लगा ..बिना तथाकथित एड्रेस वेरिफिकेशन के, यही नहीं एम्.डी. साहब
ने पूरे समय मेरा इंतज़ार किया फ़ोन पर, जब तक मेरा इंटरनेट कनेक्शन...ऊ
का कहते हैं कि कनेक्टेड नहीं हो गया....और तो और दूसरे दिन, फिर तीसरे दिन
भी फ़ोन करके पूछा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है न...!
तो ई है जी अंग्रेजी मईया की किरपा....
हाँ नहीं तो..!
आगे भी जाने न तू.. आवाज़ हमरी ही है और किसकी होगी हीयाँ ??
कल
हमारे घर हमारे एक मित्र, जो सरदार हैं, आये...बहुत ही खूबसूरत शख्शियत
के मालिक हैं वो...रंग ज़रा सा दबा हुआ है उनका, बाकी, कद-काठी, डील-डौल
तो बस माशाल्लाह, सर पर करीने से बनी हुई लाल पगड़ी , उतने ही करीने से
सजी दाढ़ी और मूंछ कुल मिलाकर रौबदार चेहरा....चाय की टेबल पर, बात चीत की
नईया ...ओसामा बिन लादेन को वाट लगाती हुई..अमेरिका के बे-सर पैर की
विदेश नीति को टक्कर मारती हुई पहुँच गयी...हिन्दुस्तान की आबो हवा तक...
हिन्दुस्तान की गर्मी की जब बात चली
तो...हम भी का जाने क्यूँ पगड़ी की लम्बाई-चौडाई में उलझ गए...पूछ ही
लिया.. विज साहब..! गर्मी में पगड़ी तो बड़ी दुःखदाई होती होगी...कहने
लगे.. परेशानी तो होती है...लेकिन अब हमें भी इसकी लत लग चुकी है ...मैंने
कहा, वैसे ये पगड़ी है बड़े काम की चीज़ ...बहुत सारे ऐब छुपा देती
है...अब देखिये ना...हमने कभी कोई गंजा सरदार नहीं देखा...जबकि हम भी
जानते हैं कि सरदार भी गंजे होते हैं...अब इस पगड़ी की महिमा देखिये
...सरदारों की पगड़ी के नीचे, घने-काले रेशमी बालों की आस लगाये बैठे हम
जैसे लोग, अगर अपने अड़ोस-पड़ोस में जरा सी ताका-झांकी करें , तो किसी
अटरिया पर किसी सरदार जी को, धूप में अपनी ज़ुल्फ़ सुखाते देख, गश खा जाते
हैं....गाय, जमके खेती चर गयी है, ऐसा ही कुछ नज़ारा नज़र आया
है......लेकिन किसी पर्दानशीं के मुहासों वाले चेहरे की तरह, आपलोग भी
अपनी जुल्फों को पग-नशीं कर लेते हैं...और हम गंजे सरदारों के दर्शन से
महरूम रह जाते हैं..
विज
साहब ! आप समझ सकते हैं, बिन पगड़ीवालों के साथ ये कितनी बड़ी नाइंसाफी
है, .....ये सुनते ही वो ठहाका मार कर हंस पड़े...कहने लगे, ये बात आपने
सही कही है...
अब वो पगड़ी की महत्ता की बात करने लगे
थे...कहने लगे हमारे दसवें गुरु, 'गुरु गोविन्द सिंह जी ' चाहते थे कि हम
सरदार बिलकुल राजाओं की तरह लगे...इसलिए उन्होंने हमें पगड़ी पहनने का आदेश
दे दिया...इस पगड़ी की वजह से ही तो हम सरदार राजा की तरह लगते हैं..सच
पूछिए तो, ये हमारे सिर का ताज है...
अब हम ठहरे बिहारिन... एक बिहारिन दूसरे
बिहारी के मन की बात न जाने... ई भला कैसे हो सकता था...! हमने कहा...विज
साहब 'गुरु गोविन्द सिंह जी' थे तो बिहारी ...और ई पक्की बात है, ऊ 'राजा'
'प्रजा' की खातिर ई काम नहीं किये थे...बिहारी लोग बहुत प्रैक्टिकल होते
हैं...माजरा कुछ और रहा होगा...
और तब हम लग गए व्याख्या करने में...
हमारा तर्क बड़ा ही सीधा-सरल था...हम
बोले....जहाँ तक हम जानते हैं 'सिख' का अर्थ होता है 'शिष्य', श्री गुरु
गोविन्द सिंह जी..उस दिनों औरंगजेब के पाँव उखाड़ने में लगे हुए थे...और
इसके लिए उन्होंने एक सैन्य-टुकड़ी की स्थापना की...ज़ाहिर सी बात थी, हर
आर्मी की तरह इस टुकड़ी को भी एक ड्रेस कोड दिया गया...और ये ड्रेस कोड
बने ...केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण....
केश :
सेना के बहादुर नौजवान हमेशा जंगलों में ही छुपे रहते थे...उनका जीवन
छुपने-भागने में ही बीतता था..इसलिए उनके पास हजामत बनाने जैसी बातों के
लिए फुर्सत ही कहाँ थी...बढ़ी हुई दाढ़ी के कई फायदे थे, वो आसानी से मुग़ल सैनिकों में मिल जाते थे, बढ़ी हुई दाढ़ी उनके लिए
नकाब का भी काम करती थी, जिससे वो मुग़ल सैनिकों को चकमा देकर भाग सकते
थे....सिर के लम्बे बाल उसकी खोपड़ी की सुरक्षा के लिए भी उपयुक्त थे..और
कभी कभी किसी महिला का रूप धारने में भी सहूलियत होती थी...पगड़ी की
आवश्यकता भी इन्ही लम्बे बालों की वजह से आन पड़ी...पगड़ी शायद ६ गज लम्बा
मलमल के कपड़े से बनती है...यह कपड़ा हर तरह से उपयोगी था...पतला मलमल
जल्दी सूख जाता था, हल्का इतना कि ये बोझ भी नहीं था और मजबूत ऐसा कि
रस्सी के काम आ जाए... सर पर बाँधने से सिर की बचाईश भी हो जाती थी...जब
दिल किया पहन लिया, जहाँ दिल किया बिछा लिया और जरूरत पड़ने पर ओढ़ लिया...
कंघा :
लम्बे बाल और लम्बी दाढ़ी...जंगल का जीवन और भागा-दौड़ी....जब खाना-पीना
ही मुहाल था तो केश-विन्यास की बात ही कौन सोचे भला...! और जब हजामत नहीं
हो पाती थी तो बालों को तरतीब से रखने के लिए इससे उपयुक्त उपकरण और भला
क्या हो सकता था...! इसलिए हर सैनिक अपने पास कंघा रखता था..
कड़ा :
कड़ा, धातु का बना हुआ मजबूत छल्ला होता है, इसका उपयोग कई तरह से किया
जा सकता था ..रस्सी बाँधने के लिए, रस्सी पर सरकने के लिए, पेड़ों पर चढ़ने
के लिए, और ज़रुरत पड़ने पर हथियार की तरह भी इसका इस्तेमाल बहुत आराम से
किया जा सकता था...
कच्छा : यह पुरुषों के लिए एक ढीला-ढाला अंतरवस्त्र (underwear) होता था, आराम दायक और सुविधाजनक..
कृपाण :
कृपाण, एक तलवारनुमा घातक हथियार होता है...जो आकार में तलवार से छोटा
होता है...जिसे आसानी से पहने हुए वस्त्रों के अन्दर छुपाया जा सकता था..और
ज़रुरत पड़ने पर बाहर निकाला भी जा सकता था ...आकार छोटा होने के कारण यह
दूर से दिखाई भी नहीं पड़ता था, लेकिन काम यह तलवार की तरह ही करता
है...इसे बहुत ही उपयोगी हथियार माना जा सकता है...बिना शक-ओ-शुबहा इसे
लेकर सिख सैनिक कहीं भी आया-जाया करते थे...
मेरी
अधिकतर बातों से विज साहब को कोई परहेज़ नहीं हुआ ...बस मेरा गुरु
गोविन्द सिंह जी को 'बिहारी' कहना उनको रास नहीं आया...परन्तु इतिहास को
झुठलाया भी तो नहीं जा सकता ...श्री गोविन्द सिंह जी का जन्म 'पटना साहब'
में हुआ था, यह उतना ही सच है जितना सूरज हर रोज़ निकालता है...उनकी इस
कामयाबी में बिहार के पानी का असर भी हुआ ही होगा....और इस बात को झुठलाया
भी नहीं जा सकता है...
सिर्फ
गुरु गोविन्द सिंह जी ही क्यूँ...बिहार में तो बड़े-बड़ों को ज्ञान की
प्राप्ति हुई है...जैसे गौतम बुद्ध, अगर वो 'बोध गया' नहीं जाते तो क्या
वो बुद्ध कहाते ? और महावीर जी...? जैन धर्म के प्रवर्तक श्री महावीर जी
का भी जन्म बिहार में ही हुआ था...
सच
कहें तो...गुप्त वंश, मौर्य वंश इत्यादि महान साम्राज्यों की राजधानी
बनने का गौरव, पाटलिपुत्र अर्थात पटना को ही प्राप्त हुआ है...दुनिया भर
में प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय भी बिहार में ही है...मेगास्थनीज, जैसा
यूनानी राजदूत जिसे सेल्यूकस ने यूनान से भेजा था... फाहियान और हुएनसांग
जैसे यात्री, भारत दर्शन करने के लिए बिहार ही आये थे... संक्षेप में
कहूँ तो ..भारत का प्राचीन इतिहास का अर्थ ही है बिहार का इतिहास....
इन सारी बातों से एक बात तो सिद्ध हो ही रही थी...कुछ तो बात है.... बिहार के पानी में...!
हाँ नहीं तो..! छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए..आवाज़ 'अदा' की...
हमारे पड़ोस में रहते थे धनपति रामसिंहासन पाण्डेय ...दो बेटियाँ ..एक बेटा....संजय...
बेटियों की शादी हो चुकी थी बड़े-बड़े घरों में....कभी कभार आती थी वो
दोनों...उनकी पत्नी का भी स्वर्गवास हुए कुछ वर्ष हो चुके थे...
बात
हम करते हैं संजय की....संजय हमसे उम्र में बहुत बड़े थे हमलोग भईया कहते
थे उन्हें...उनकी शादी हो चुकी थी शीला भाभी से और उनका भी एक बेटा था
विशाल.....शीला भाभी को मैंने कभी भी जोर से बोलते नहीं सुना था...हर वक्त
उनके सर पर आँचल हुआ करता था...हम लोग दौड़ कर उनसे लिपट जाते, तो अपने हाथ
से हमेशा मेरे बाल सहलाया करती थी....वो शाही टुकड़ा बहुत अच्छा बनाती
थी....जिस दिन भी उनके घर बनता था, एक कटोरी में मेरे लिए ज़रूर भेज देतीं
थीं....
संजय भईया..अच्छे खासी पर्सनालिटी के मालिक थे ..६ फीट
उंचाई, गोरा रंग, भूरी आँखें और रोबदार चेहरा.... एक तो अकेले बेटे उसपर
से अपार संपत्ति....कभी न पढ़े-लिखे, न ही कभी...कुछ काम
किया...ज़रुरत ही नहीं पड़ी.....बस दिन भर दारू पीना और और महफ़िल सजाये रखना,
घर पर दोस्तों की या फिर टनडेली करना....
कहते हैं न, शुरू में आप
शराब पीते हैं, फिर शराब आपको पीती है...संजय भईया भी कहाँ अपवाद
थे....होते-होते शराब ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया...उनको लीवर सिरोसिस
हो गया और ६ फीट का आदमी ४ फीट का कैसे हो जाता है, यह मैंने तभी देखा
था....खूबसूरत बदन हड्डियों का ठठरी हो गया था.....शीला भाभी ने अपनी
आँखों की नींद को, अपने पास महीनों नहीं फटकने दिया....आँचल पसार-पसार कर
सारे व्रत कर गयी थी वो....लेकिन भगवान् को तो अपना काम करना था .....सो एक
दिन संजय भईया को इस दुनिया से जाना ही पड़ा...शीला भाभी और विशाल को छोड़
कर....अब घर में मात्र शीला भाभी, विशाल जिसकी उम्र २-३ वर्ष कि थी और
पाण्डेय जी रह गए.....
एक दिन की बात है, शीला भाभी हमारे घर, सर पर
आँचल रख कर धड-फड करतीं हुई आई और भण्डार घर में छिप गयीं...मैं बहुत छोटी
थी, मुझे बात समझ नहीं आई.....मैंने सिर्फ इतना देखा कि वो बहुत रो रहीं थीं,
और मेरी माँ से कहती जातीं थीं, कि हम नहीं जायेगे ..आपलोग हमको कैसे भी करके, यहीं
से मेरे मायके भेज दीजिये.....बाहर पाण्डेय जी ने हाहाकार मचाया हुआ था, कि
उसको भेजो बाहर.....पाण्डेय जी का वर्चस्व और यह उनकी बहु की बात...कौन
भला इसमें टांग अडाता.....आखिर, शीला भाभी को जाना ही पड़ा ...कोई कुछ
भी नहीं कर पाया ....
इस बात को गुजरे शायद २५-२६ साल भी हो गए
होंगे....और मुझे इस बात को समझने में इतने ही वर्ष लग गए .. मैं जब भी
भारत जाती हूँ ..ज्यादा से ज्यादा ५ हफ्ते ही रह पाती हूँ...समय इतना कम होता इसलिए कभी भी शीला
भाभी से मिलना नहीं हुआ....पिछले वर्ष किसी कारणवश मुझे पूरे ६ महीने रहना
पड़ा....
एक दिन, मैं किसी होटल से माँ-बाबा के लिए कुछ खाना बंधवा
रही थी..काउंटर पर खड़ी थी कि अचानक किसी ने मेरे पाँव छुए....खूबसूरत सा
नौजवान था...कहने लगा बुआ आप हमको नहीं पहचान रहे हैं लेकिन हम आपको पहचान
गए....मैंने वास्तव में उसे नहीं पहचाना ....कहने लगा हम विशाल हैं
बुआ...संजय पाण्डेय के बेटे.....मुझे फिर भी वक्त लगा.....आपकी शीला
भाभी...वो मेरे दादा रामसिंहासन पाण्डेय....एकबारगी मैं ख़ुशी के अतिरेक
में चिल्लाने लगी...ज्यादा परेशानी नहीं हुई क्यूंकि लगभग सब मुझे वहां
जानते ही थे....मैंने कहा अरे विशाल !! तुम इतना बड़ा और इतना हैंडसम हो
गया है......माँ कैसी है तुम्हारी ?? अच्छी है बुआ ...आपके बारे में अक्सर
बात करती है....चलिए न बुआ घर...माँ से मिल लीजिये.... बहुत खुश हो
जायेगी.....मेरा मन भी एकदम से शीला भाभी से मिलने को हो गया.....अरे विशाल
घर पर माँ-बाबा को इ खाना पहुँचाना है...आज उलोगों को बाहर का खाना खाने
का मन हुआ है.....उ लोग आसरा में बैठे होंगे.....वो बोला ..हाँ तो कोई बात
नहीं बुआ....चलिए उनको खाना खिला देते हैं, फिर हम आपके साथ अपने घर चलेंगे
...हम भी मिल लेंगे दादा-दादी से.....चलो ठीक है.....उसके पास मोटर साईकिल
थी, उसी पर बैठ कर हम अपने घर आ गये...माँ-बाबा को खाना खिलाते खिलाते, ये भी
पता चल चल गया, कि अब रामसिंहासन पाण्डेय जी भी नहीं रहे.....विशाल ने MBA
किया है और किसी अच्छी सी कंपनी में अब नौकरी भी कर रहा है...माँ के हर सुख
का ख्याल रखता है...
माँ-बाबा को खाना खिला कर हम विशाल के साथ,
शीला भाभी से मिलने उनके घर गए.....घर बिलकुल साफ़ सुथरा...हर चीज़ करीने से
लगी हुई...संजय भईया की तस्वीर टंगी हुई थी दीवार पर ...चन्दन की माला से
सजी हुई....देख कर मन अनायास ही बचपन में कूद गया...माँ !! माँ !! देखो न
कौन आया है..?? देखो न !! अरे कौन आया है ?? बोलती हुई एक गरिमा की
प्रतिमा बाहर आई...मेरी शीला भाभी बाहर आयीं ...सफ़ेद साडी में लिपटी....सर
पर आँचल लिए हुए शीला भाभी ...उम्र की हर छाप को खुद में समेटे हुए ...शीला
भाभी खड़ी थी मेरे सामने....मुझे देखते ही...थरथराते हुए होंठों से
कहा...मुना बउवा अभी याद आया अपना भाभी का...?? .मैं भाग कर उनसे यूँ लिपटी
जैसे ...दो युग आपस में मिल रहे हों....आँखों से अश्रु की अविरल धारा रुक
ही नहीं पा रही थी...मैं उनसे ऐसे चिपकी थी जैसे उनका सारा दर्द सोख लेना
चाहती थी.....संजय भईया की आँखें मुझे देख रहीं थीं और मेरी आँखें उनसे
यही कह रहीं थीं....भईया कुछ आँचल तार-तार हो जाते हैं लेकिन मैला कभी
नहीं होते ..कभी नहीं !!!.
अब एक गीत हो जाए... तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे....आवाज़ संतोष शैल और 'अदा' की...
हे भगवान् !..आज फिर देर हो जायेगी ..ओ भईया ज़रा जल्दी करना ...मैंने रिक्शे वाले से कहा ..वो भी बुदबुदाया ..रिक्शा है मैडम हवाई जहाज नहीं...और मैं मन ही मन सोचे जा रही थी...ये भी न ! एक कप चाय भी नहीं बना सकते सुबह, रोज मुझे देर हो जाती है और डॉ.चन्द्र प्रकाश ठाकुर की विद्रूप हंसी के बारे में सोचती जाती...ठाकुर साहब को तो बस मौका चाहिए, मेरी तरफ ऐसे देखते हैं जैसे अगर आँख में जीभ होती तो निगल ही जाते, फिर बुलायेंगे मुझे अपने ऑफिस में और देंगे भाषण...हे भगवान् ! ये मेरे साथ ही क्यूँ होता है....
अब एक इत्मीनान मुझ पर हावी होने लगा था ...शुक्र है पहुँच गई ..मैंने पर्स से बीस का नोट निकाला, रिक्शे वाले के हाथ में ठूंसा और लगभग छलांग मारती हूँ ऑफिस की सीढियां चढ़ने लगी., ओ माला ...! माला ..! मुझे उस वक्त अपना नाम दुनिया में सबसे बेकार लगा था, अब ये कौन है...कमसे कम रजिस्टर में साईन तो कर लेने दो यार, ये बोलते हुए मैं मुड़ी...सामने थी एक बड़ी दीन-हीन सी महिला, मेरे चेहरे पर हजारों भाव ऐसे आए, जो उसे बता गए ...तुम कौन हो मैडम ? मुझे ऐसे आँखें सिकोड़ते देख उसने कहा अरे मैं हूँ रीना...हम एक साथ थे सेंट जेविएर्स में...मेरा मुँह ऐसे खुल गया जैसे ए.टी.एम्. का होल हो, वह मेरे आश्चर्य को पहचान गई ..और कहा..तू कैसे पहचानेगी..जब मैं ही ख़ुद को नहीं पहचानती...
लेकिन तब तक मेरी याददाश्त ने मेरा साथ दे दिया , अरे रीना ! तू SSSSSSS ! मैंने झट से उसे गले लगा लिया, और झेंपते हुए कहा ..अरे नहीं री !...इतने सालों बाद तुम्हें देखा न...इसलिए, लेकिन देख ५ सेकेंड से ज्यादा नहीं लगाया...और बता तू कैसी है.? तू तो बिल्कुल ही ॰गायब हो गई...मैं बोलती जाती और उसको ऊपर से नीचे तक देखती भी जाती....हमदोनों वहीं बैठ गयीं , बाहर बेंच पर, अब जो होगा देखा जाएगा...सुन लेंगे ठाकुर सर का भाषण और झेल लेंगे उनकी ऐसी वैसी नज़रें ..हाँ नहीं तो...:)
मैं उसका मुआयना करती जाती थी और सोचती जाती थी क्या इन्सान इतना बदल सकता है...इतनानानाना ????
रीना हमारे कॉलेज की बेहद्द खूबसूरत लड़कियों में से एक थी...जितनी खूबसूरत थी वो , उतनी ही घमंडी भी थी, नाक पर मक्खी भी बैठने नहीं देती थी, किसी का भी अपमान कर देना उसके लिए बायें हाथ का खेल था...मैं उससे थोड़ी कम खूबसूरत थी शायद, लेकिन गाना बहुत अच्छा गाती थी..इसलिए उससे ज्यादा पोपुलर थी...और रीना को यह बिल्कुल भी गंवारा नहीं था...उसने मुझसे कभी भी सीधे मुँह बात नहीं की थी...हमारे कॉलेज में सौन्दर्य प्रतियोगिता हुई ..मुझे तो ख़ैर घर से ही आज्ञा नहीं थी ऐसी प्रतियोगिता में भाग लेने की...लेती भी तो हार जाती ..रीना बाज़ी मार ले गई ...और उसके बाद वो बस सातवें आसमान में पहुँच गई....इसी प्रतियोगिता में किसी बहुत अमीर लड़के ने उसे देखा था...और फर्स्ट इयर में ही उसकी शादी हो गई...उसके बाद, वो एक दिन आई थी कॉलिज अपने पति के साथ और फिर हमारी कभी उससे मुलाक़ात नहीं हुई ...
एक ज़माने के बाद, मैं आज देख रही हूँ रीना को...मुझे याद है शादी के बाद, जिस दिन वो आई थी कॉलेज अपने पति के साथ ..कितनी सुन्दर जोड़ी लग रही थी...कार के उतरी थी वो, उसका पति हैंडसम, स्मार्ट, खूबसूरत, ऊंचा...रीना तो बस रीना राय ही लग रही थी..मेंहदी भरे हाथ, चूड़ा , गहने, कीमती साड़ी और गर्वीली चाल, ऊँची एड़ी में,
कॉलेज में कितनों के दिल पर साँप लोट गया था उस दिन, मैं भी कहीं से जल ही गई थी, लेकिन इस समय मेरी नज़र उसके हाथों से नहीं हट पा रही थी, हाथ कुछ टेढ़े से लग रहे थे मुझे, उसने भी मेरी नज़र का पीछा किया और अपने हाथ साड़ी में छुपा गई...
मेरी चोरी पकड़ी गई थी, उसके हाथों को देखते हुए, झेंप मिटाने के लिए, मैंने पूछ लिया, कैसा चल रहा है सब कुछ ? बोलते हुए मेरी नज़र उसकी माँग पर गई, माँग में कोई सिन्दूर नहीं था, लेकिन आज कल किसी के बारे में इससे कहाँ पता चलता है...कि वो शादी-शुदा है या नहीं, मैं नज़रों से उसे टटोलते हुए बोल रही थी...बोलो न, कितने बच्चे हैं ? वो फुसफुसाई....एक बेटा है ..मानू! और फिर तो जैसे अल्फ़ाज़ों, भावों का बाँध टूट गया हो....माला..शादी के दो साल बाद ही मैं विधवा हो गई, जीवन के सारे रंग मिट गए...मैं कितनी ख़ुश थी माला...भगवान् ने मुझे क्या नहीं दिया था, खूबसूरत पति, बड़ा घर, गाड़ी, रुपैया-पैसा, नौकर-चाकर, एक बेटा...लेकिन एक ही झटके में सब कुछ चला गया... वो थोड़ा रुकी...फिर कहने लगी...
मैं, मेरे पति और मेरा बेटा हम तीनों शिमला गए थे घूमने, वापसी में एक्सीडेंट हो गया, इस एक्सीडेंट में मेरे पति चल बसे, मुझे बहुत चोट आई..मेरे हाथ-पाँव,रिब्स टूट गए थे...बच्चा सुरक्षित था ...मुझे ठीक होने में महीनों लग गए अस्पताल में...जब मैं वापिस ससुराल आई तो मेरा सब कुछ जा चुका था ..मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से निकाल दिया, अपने बच्चे के साथ मैं सड़क पर ही आ गई थी, इतना कहते-कहते उसका गला रुंध गया था ..मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू कर दिया था, वो बोलती जा रही थी...माँ-बाप भी रिटायर्ड हैं, तुझे पता ही है मैंने पढाई पूरी नहीं की थी, उन्होंने ही मुझे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, अब नर्स बन गई हूँ, यहीं जो सदर हॉस्पिटल है ,वहाँ दो दिन पहले ही ट्रान्सफर लेकर आई हूँ, अचानक तुझे देखा तो कितनी ख़ुशी हुई मुझे, बता नहीं सकती माला , तू तो बिल्कुल नहीं बदली रे, बिल्कुल वैसी ही लगती है तू...सच.!
अरे नहीं रे ...देख न मेरे भी दो-चार बाल अब सफ़ेद हो रहे हैं...हा हा हा, चल, ये तो बहुत अच्छा है..तू यहाँ पास में ही है ..अब तो रोज़ मिला करेंगे लंच में ...सुन तेरे को देर हो रही होगी, उसने जैसे मुझे सोते से जगाया हो, मेरी आँखों के सामने फट से ठाकुर साहब आ गए , और उनकी वही कुटिल मुस्कान ! मैंने झट से उनके ख्याल को झटक दिया , चल फिर कल मिलते हैं लंच में ...तू यहीं आ जाना मैंने उसे हिदायत दी, पक्का आ जाऊँगी बोल कर वो फिर मुझसे लिपट गई , आँखें मेरी भी नम हो गईं, और वो ख़ुद को समेटती अपना पर्स सम्हालती चल पड़ी..
मैं खड़ी होकर पीछे से उसे जाती देखती रही ...नर्स !! सेवा और त्याग का पर्याय..अपने अभिमान के चूर-चूर होने का तमाशा देखने के बाद ..इससे बेहतर पेशा और क्या हो सकता था उसके लिए ..!